मूल अंग्रेजी लेख का लिंक
Posted by Ali Sina On June 28th, 2012
इस्लाम के अनुयायी बिना थके इसका प्रचार कर रहे हैं और यह दावा करते हैं कि जल्द ही यह संसार पर अपना दबदबा कायम कर लेगा. ऐसा करते हुये वे असल में क़ुरान के खिलाफ काम कर रहे हैं. इसलिये यह कहना उचित होगा कि वे सब काफिर हैं.
कुरान कहती है (10:47),
और हर जनसमूह के लिये एक दूत है .
14: 4 के अनुसार,
और हमने बिना इसके कोई दूत नहीं भेजा है कि सन्देश उस जनसमूह की अपनी भाषा में हो ताकि वह उसे साफ साफ समझ सके .
यदि ये आयतें सच हैं तो इस्लाम ग़ैर-अरबी लोगों के लिये नहीं है. कुरान प्रमाणित करती है कि संसार के हर जनसमूह ने दैवी सन्देश अपनी अपनी भाषा में प्राप्त किये हैं ताकि वे उन्हें समझ सकें और क़ुरान केवल अरबों के लिये है.
यह अवधारणा इतनी महत्त्वपूर्ण है कि इसे कई बार दुहराया गया है.
क़ु. 16:36.
और हमने हर जनसमूह के बीच से एक दूत तैयार किया.
और हमने हर जनसमूह के बीच से एक दूत तैयार किया.
क़ु. 5:48
तुम में से हर एक के लिये हमने एक स्पष्ट दैवी नियम विधान की व्यवस्था की है और गैर मजहबी मामलों के लिये एक राह बतायी है.
तुम में से हर एक के लिये हमने एक स्पष्ट दैवी नियम विधान की व्यवस्था की है और गैर मजहबी मामलों के लिये एक राह बतायी है.
क़ु. 32:3
यह (क़ुरान) तुम्हारे अल्लाह से आया सच है; ताकि तुम (मुहम्मद) उन लोगों को चेता सको जिनको चेताने के लिये तुमसे पहले कोई दूत नहीं आया है, कि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो सके.
यह (क़ुरान) तुम्हारे अल्लाह से आया सच है; ताकि तुम (मुहम्मद) उन लोगों को चेता सको जिनको चेताने के लिये तुमसे पहले कोई दूत नहीं आया है, कि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो सके.
कु. 36.6
[यह एक इलहाम है] कि तुम उन लोगों को चेता सको जिनके पुरखे नहीं चेताये गये थे, और इसलिये वे बेखयाली में हैं.
[यह एक इलहाम है] कि तुम उन लोगों को चेता सको जिनके पुरखे नहीं चेताये गये थे, और इसलिये वे बेखयाली में हैं.
इन आयतों में समझ के फेर की कोई गुंजाइश नहीं है. अल्लाह कह रहा है कि संसार के हर मानव समूह के पास उसके अपने दूत रहे हैं जिन्हों ने उन्हें उन्हीं की भाषा में चेताया, और मुहम्मद उनके लिये है जिन्हें अब तक भी कोई गाइड करने वाला नहीं मिला है, और जिनके पुरखे भी नहीं चेताये गये थे यानि कि अरबों के लिये है. इस तरह उनके पास कोई बहाना नहीं बचता और वे कह भी नहीं सकते, लेकिन हम इतनी साफ बात से भी कुछ नहीं सीख सके.
क़ु. 6: 156- 157 व्याख्या करता है,
वरना तुम कहोगे, हम लोगों से पहले किताब केवल दो जनसमूहों को भेजी गई (यहूदी और ईसाई ) और हक़ीकत में हमे वह नहीं पता था जो वे पढ़ते हैं .
वरना तुम कहोगे, हम लोगों से पहले किताब केवल दो जनसमूहों को भेजी गई (यहूदी और ईसाई ) और हक़ीकत में हमे वह नहीं पता था जो वे पढ़ते हैं .
या तुम कहोगे, अगर किताब हम तक भेजी गई होती, तो हम उनकी तुलना में निश्चय ही बेहतर ढंग से बताये गये होते. अब तुम्हारे अल्लाह की ओर से तुम तक एक साफ प्रमाण आया है और मार्गदर्शन भी और एक कृपा भी.
क़ुरान केवल अरबों को समझ आती है. ग़ैर अरब इसे नहीं समझते. इस्लाम के अनुयायी यह जोर दे कर कहते हैं कि क़ुरान का कोई अनुवाद सटीक नहीं हो सकता. इसलिये, यह कभी भी ग़ैर अरबियों को स्पष्ट समझ में नहीं आ सकती. यह बात समझदारी की लगती है क्यों कि क़ुरान का सन्देश गैर अरबों के लिये बना ही नहीं है.
क़ुरान केवल अरबों के लिये भेजी गयी थी इसकी पुष्टि इन आयतों में है 26: 198-199
और अगर हम इसे गैर अरबों में से किसी एक को भेजे होते, और वह इसे उनके सामने पढ़ा होता तो वे इस पर कभी विश्वास नहीं कर पाते.
जिस तरह से अरबों को ग़ैर अरबी जुबान में रची किसी दैवी किताब में विश्वास करने का कोई तुक नहीं बनता वैसे ही गैर अरबियों के लिये भी अरबी में रची किसी किताब पर भरोसा करने का कोई तुक नहीं बनता. इसीलिये अल्लाह संसार के अलग अलग हर लोगों को उनकी अपनी जुबान में बताने वाला दूत भेजता है ताकि वे समझ सकें. यह एकदम समझने वाली बात है.
यह एकदम पक्का करने के लिये कि कोई नासमझी न रह जाये, क़ुरान 5:19 में दुहराया गया है:
किताब में वर्णित हे लोगों, देवदूतों की पहले भेजी गयी कड़ी में एक विराम के बाद तुम्हारे पास हक़ीकत में हमारा दूत पहुँचा है, जो कि बातों को साफ साफ बताता है वरना तुम कहोगे कि हमारे पास खुश लहरों का कोई वाहक नहीं आया और कोई चेताने वाला नहीं आया . इसलिये खुश लहरों का एक वाहक और एक चेताने वाला वास्तव में तुम्हारे पास आया है. और अल्लाह सबसे ताकतवर है.
क़ुरान के अनुसार संसार के सभी लोगों के पास दैवी सन्देश पहुँचे हैं. ऊपर की आयत यह कहती है कि क़ुरान उनके लिये है जिन्हें दैवी सन्देश उससे पहले कभी नहीं मिला. अगर क़ुरान नहीं आती तो वे कहते कि हमारे पास खुश लहरों का कोई वाहक नहीं आया और कोई चेताने वाला नहीं आया .
मामला साफ है, लेकिन अल्लाह यह चाहता है कि बात लोगों में सबसे बेवकूफ को भी समझ में आ जाय. वह उस इलाके का एकदम सही नाम बता देता है जिसके लिये मुहम्मद भेजा गया था.
क़ु. 6:92
और यह एक किताब है जिसे हमने प्रकट किया है, जो कृपा से भरी है, उसे भरपूर करने के लिये जो इससे पहले प्रकट हुई थीं, और तुम्हें शहरों की माँ और उसके आस पास के इलाकों के सभी वासियों को चेताने के लिये है.
और यह एक किताब है जिसे हमने प्रकट किया है, जो कृपा से भरी है, उसे भरपूर करने के लिये जो इससे पहले प्रकट हुई थीं, और तुम्हें शहरों की माँ और उसके आस पास के इलाकों के सभी वासियों को चेताने के लिये है.
أُمَّ الْقُرَى وَمَنْ حَوْلَهَا
‘शहरों की माँ’ यानि ‘उम उल क़ुरा’ मक्का को कहते हैं. यह आयत कहती है कि मक्का और उसके आस पास के इलाके के लोगों को चेताने के लिये इस्लाम भेजा حَوْلَهَا. यह समस्त मानव जाति के लिये कैसे हो सकता है?
तो यह सबसे बेवकूफ आदमी को भी स्पष्ट है, लेकिन अल्लाह जानता है कि कुछ लोग वाकई महामूर्ख होते हैं और वह मामला उन्हें भी समझाना चाहता है. इसलिये वह वही बात आयत 42:7 में दुहराता है.
इस प्रकार हमने अरबी में क़ुरान तुम्हारे लिये प्रकट की, ताकि तुम शहरों की माँ (‘उम उल क़ुरा’) और उसके आस पास के इलाकों के सभी वासियों को चेता सको.
मैंने सुना है कि कुछ इस्लाम अनुयायी कहते हैं कि आस पास का मतलब सब ओर से है. यह आस पास या घेरे की परिभाषा नहीं है. जब हम रोम और उसको घेरे इलाके की बात करते हैं तो हम रोम से संलग्न इलाकों में पेरिस, लन्दन, टोकियो और न्यूयार्क की गिनती नहीं कर रहे होते हैं. वे जो इस तरह का तर्क दे रहे होते हैं असल में यह जता रहे होते हैं कि अल्लाह कहता कुछ है और मायने कुछ और रखता है. दूसरे शब्दों में वह लोगों को धोखा दे रहा है. क़ुरान बार बार दावा करती है कि ‘वह स्पष्ट किताब है’ (5:15), ‘समझने में आसान है’ (44:58 , 54:22 , 54:32, 54:40), ‘तफसील से समझायी गयी है’ (6:114), ‘स्पष्ट कही गई है’ (5:16, 10:15) और ‘इसमें कोई सन्देहास्पद बात नहीं है’ (2:1).
अब, मुझे पक्का यकीन है कि कुछ इस्लामी दूसरी आयतों के उदाहरण दे सकते हैं जिनमें ऐसा कुछ हो जो यह बताता हो कि क़ुरान पूरी मानवता के लिये है. अगर वह ऐसा करेंगे, तो वे यह सिद्ध कर देंगे कि ऊपर बतायी गयी आयतें ग़लत हैं.
या तो क़ुरान झूठों और विरोधाभासों का पुलिन्दा है या यह केवल मक्का और उसके घेरे अन्य इलाकों के अरबों के लिये है. आप निर्णय करें कि क्या ठीक है.
मैं इन दिनों इस्लाम का अध्ययन कर रहा हूं। चुनिंदा अंशों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की स्थिति में नहीं हूं।
ReplyDeleteओरिजनल साइट पर पढ़ो, साथ ही कोरिलेट करते चलो और वहाँ की बहसें देखो. सब क्लियर हो जायेगा.
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